ऐन फ्रैंक के डायरी के पन्ने ॅ
बुधवार,, 8 जुलाई,
प्यारी किट्टी.
ऐसा लग रहा है मानो रविवार के बाद से बरसों बीत गए हों। इतना कुछ हो गया है जैसे पूरी दुनिया ही उलट-पुलट गई है। लेकिन जैसा कि तुम देख सकती हो, किट्टी, मैं जिंदा हूँ, लेकिन यह मत पूछो कि कहाँ और कैसे। मैं जो कुछ भी कह रही हूँ उसमें शायद ही कोई बात तुम्हारे पल्ले पड़े, इसलिए मैं तुम्हें शुरू से बताती हूँ कि रविवार की दोपहर को क्या हुआ था।
तीन बजे थे। हैलो जा चुका था लेकिन वह दोबारा फिर से आने वाला था, तभी दरवाजे की घंटी बजी। चूंकि मैं बाल्कनी में धूप में अलसाई सी बैठी पढ़ रही थी इसलिए मुझे घंटी की आवाज सुनाई नहीं दी। कुछ देर बाद रसोई के दरवाजे पर मार्गोट नज़र आई। वह बहुत गुस्से में थी- पापा को ए. एस.एस. से बुलाए जाने का नोटिस मिला है, वह फुसफुसाई। माँ मिस्टर वान दान को देखने गई हुई हैं। मिस्टर वान दान पापा के बिजनेस पार्टनर हैं और उनके अच्छे दोस्त हैं।
मैं आवाक् रह गई थी।
बुलावा?
हर कोई जानता था कि बुलावे का क्या मतलब होता है यातना शिविरों के नज़ारे और वहाँ की कोठरियों के दृश्य मेरी आँखों के आगे तैर गए। हम अपने पापा को इस तरह की नियति के भरोसे कैसे छोड़ सकते थे। हम उन्हें हर्गिज नहीं जाने देंगे। मार्गोट ने उस वक्त कहा था जब वह ड्राइंग रूम में माँ की राह देख रही थी। माँ मिस्टर वान दान से पूछने गई हैं कि हम कल ही छुपने की जगह पर जा सकते हैं। वान दान परिवार भी हमारे साथ जा रहा है। हम लोग कुल मिलाकर सात लोग होंगे। मौन हम आगे बात ही नहीं कर पाए। यह खयाल कि पापा यहूदी अस्पताल में किसी को देखने गए हुए हैं, माँ के लिए इंतज़ार की लंबी घड़ियाँ, गरमी सस्पेंस, इन सारी चीजों ने हमारे शब्द ही हमसे छीन लिए थे। तभी दरवाजे की घंटी बजी यह हैलो ही होगा, मैंने कहा था।
दरवाजा मत खोलो, मागट ने हैरान होते मुझे रोका, लेकिन इसकी जरूरत नहीं थी क्योंकि हमने नीचे से माँ और मिस्टर वान दान को हैलो से बात करते हुए सुन लिया था। तब दोनों ही भीतर आए और अपने पीछे दरवाजा बंद कर दिया। जब भी दरवाजे की घंटी बजती तो मुझे या मार्गोट को उचककर नीचे देखना पड़ता कि क्या पापा आ गए हैं। हमने किसी और को भीतर नहीं आने दिया मुझे और मार्गोट को बाहर भेज दिया गया था क्योंकि वान दान माँ से अकेले में बात करना चाहते थे। जब मैं और मार्गोट बेडरूम में बैठे बात कर रहे थे तो उसने मुझे बताया कि यह बुलावा पापा के लिए नहीं बल्कि खुद उसके लिए था। इस दूसरे सदमे से मैं तो चीखने लगी। मार्गोट सोलह बरस की थी। तय है कि वे लोग इस उम्र की लड़कियों को उनके खुद के भरोसे यहाँ से भेजना चाहते हैं। लेकिन भगवान का शुक्र है, वह नहीं जाएगी। माँ ने मुझसे यही कहा था। पापा जब मुझसे छिपने की जगह पर जाने की बात कर रहे थे तो उन्होंने भी शायद यही कहा होगा।
अज्ञातवास...हम कहाँ जाकर छुपेंगे? शहर में? किसी घर में? किसी परछत्ती पर? कब. ... कहाँ... कैसे... ये ऐसे सवाल थे जो मैं पूछ नहीं सकती थी लेकिन फिर भी ये सवाल मेरे दिमाग कुलबुला रहे थे। में
मार्गोट और मैंने अपनी बहुत जरूरी चीजें एक थैले में भरनी शुरू कीं । मैंने सबसे पहले अपने थैले में यह डायरी हँसी। इसके बाद मैंने कर्लर, रुमाल, स्कूली किताबें, एक कंघी और कुछ पुरानी चिट्टियाँ थैले में डाली। मैं अज्ञातवास में जाने के खयाल से इतनी अधिक आतंकित थी कि मैंने थैले में अजीबोगरीब चीजें भर डालीं, फिर भी मुझे अफ़सोस नहीं है। स्मृतियाँ मेरे लिए पोशाकों की तुलना में ज्यादा मायने रखती हैं। तब हमने मिस्टर क्लिीमेन को फ़ोन किया कि क्या वे शाम को हमारे घर आ पाएँगे।
मिस्टर वान दान चले गए ताकि मिएप को लिवा ला सकें। मिएप आई और वादा किया कि वे रात को एक बार फिर आएँगी। वे अपने साथ जूतों, ड्रेसों जैकेटों, अंडरवियरों तथा स्टॉकिंग्स से भरा एक थैला लेकर गईं। इसके बाद हमारे फ़्लैट में सन्नाटा छा गया। हममें से किसी की भी खाना खाने की इच्छा ही नहीं हुई। मौसम अभी भी गरम था और सारी चीजें जैसे हमारे लिए अजनबी होती चली जा रही थीं। हमने अपना ऊपर वाला एक बड़ा कमरा तीसेक बरस के एक विधुर मिस्टर गोल्डरिम्ट को किराए पर दे रखा था। तय था कि उसे उस शाम कोई काम धंधा नहीं था, इसके बावजूद हमारे कई इशारों के बावजूद वह रात दस बजे तक वहीं पर मँडराता रहा। मिएप और जॉन गिएज रात ग्यारह बजे आए। मिएप 1933 से पापा. की कंपनी में काम कर रही थीं और इसलिए पापा के करीबी दोस्तों में थीं। उसके पति जॉन भी पापा के अच्छे दोस्त थे। एक बार फिर जूते, स्टॉकिंग्स, अंडरवियर और किताबें मिएप के गहरे बैग और जॉन की जेबों में गायब हो रही थीं। साढ़े ग्यारह बजे वे खुद भी विदा लेकर चले गए। मैं बुरी तरह से थक गई थी. फिर भी एक बात मैं अच्छी तरह जानती थी कि यह रात मेरे अपने बिस्तर में मेरी आखिरी रात है। मैं जैसे घोड़े बेचकर सोई । मेरी नींद अगली सुबह साढ़े पाँच बजे मार्गोट के जगाने पर ही खुली किस्मत से यह सुबह रविवार की तरह गरम नहीं थी। दिन भर गरम बरसात की फुहारें पड़ती रहीं। हम चारों ने अपने बदन पर इतने ज्यादा कपड़े ले लिए थे मानो हम रात फ्रिज में गुजारने जा रहे हों। वजह सिर्फ़ इतनी सी थी कि हम अपने साथ ज्यादा से ज्यादा कपड़े ले जाना चाहते थे। हम जिस स्थिति में थे उसमें कोई यहूदी व्यक्ति कपड़ों से भरा सूटकेस ले जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। मैंने दो बनियानें तीन पैंटें एक ड्रेस और उसके ऊपर एक स्कर्ट, एक जैकेट, एक बरसाती दो जोड़ी स्टॉकिंग्स, भारी जूते, एक कैप, एक स्कार्फ़ और इन सबके अलावा और भी बहुत कुछ ओढ़ पहन रखा था। घर से निकलने से पहले ही मेरा दम घुटने लगा था लेकिन किसी को भी परवाह नहीं थी कि मुझसे पूछे- ऐन, कैसा लग रहा है तुम्हें?
मार्गोट ने अपने थैले में स्कूल की किताबें ठूंस ली थीं और वह अपनी साइकिल लेने चली गई और फिर वह मिएप की निगरानी में अज्ञात जगह के लिए रवाना हो गई। कुछ भी रहा हो, मेरे लिए तो वह अनजान जगह ही थी; क्योंकि मुझे अभी भी पता नहीं था कि हम कहाँ जाने वाले हैं। साढ़े सात बजे हमने भी अपने पीछे दरवाज़ा बंद किया। मूर्जे ही एकमात्र ऐसी जीवित प्राणी थी।
जिसे मुझे गुड बाई कहना था । हमने गोल्डरिम्ट के लिए जो नोट छोड़ा उसके अनुसार बिल्ली को पड़ोसियों के यहाँ छोड़ा जाना था। वे ही अब उसकी देखभाल करने वाले थे। खाली बिस्तरे, मेज पर बिखरा नाश्ते का सामान, रसोई में बिल्ली के लिए सेर भर मीट, ये सारी चीजें यही दर्शाती थीं कि हम बहुत ही हड़बड़ी में छोड़-छाड़कर गए हैं। लेकिन इंप्रैशन छोड़कर जाने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं थीं। हम तो किसी भी तरह वहाँ से निकल जाना चाहते थे और कहीं सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाना चाहते थे और कोई बात मायने नहीं रखती थी।
बाकी कल,